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झाडू़ बनाने वाले समुदाय

झाड़ू बनाने में किसी प्रकार की मशीनों का प्रयोग दिखाई नहीं देता। झाड़ू विशेषतः हाथ से ही बनाये जाते हैं। तेजी से बदलते भारत में यह विधायें पूर्व औद्योगिक श्रमिकों की सृजनशीलता का एक उदाहरण है। ग्रामीण महिलायें झाड़ू अपनी आवश्यकता के अनुसार आसपास उपलब्ध सामग्री से बनाती हैं वहीं व्यावसायिक तौर पर झाड़ू बनाने वाले विशिष्ट सामग्री के प्रयोग से पहचाने जाते हैं।

मसलन पू्र्व घुमक्कड़ बंजारा जाति मूंझ और पन्नी घास से झाड़ू बनाती है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण भारत से आये प्रवासी कोली समुदाय के लोग खजूर की झाड़ू बनाते हैं। हरिजन समुदाय बाँस की
पन्नी का झाड़ू बनाता हरीजन

झाड़ू बनाने में दक्ष हैं। झाड़ू के लिये सामग्री इकट्ठा करने से लेकर झाड़ू बनाकर बेचने तक के हर कार्य को ज़्यादातर ये खुद ही संभालते हैं। यह समुदाय अपने सामाजिक मानक और रीति–रिवाजों के दायरे में अपना काम अनवरत करते रहे हैं।

इन विभिन्नताओं के बावजू़द झाड़ू बनाने वाले समुदायों को भारतीय समाज में सबसे निम्न दर्जा दिया जाता है। आज भी इनमें से कुछ समुदाय जातिभेद और अस्पृश्यता के शिकार हैं। ज्ञातव्य है कि झाड़ू प्रदर्शनी की संयोजनात्मक वृत्ति में इन समुदायों के सामाजिक विकास का आयाम भी जोड़ा गया है।



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