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झाड़ू ही क्यों?

झाड़ू ही क्यों?, यह सवाल सबके मन में अनायास ही उठता है। आखिर यह एक नगण्य वस्तु है, जिसका एक सीमित अस्तित्व है, जिसे काम में लेने के बाद किसी कोने में या बिस्तर के नीचे पटक दिया जाता है। यह न तो कोई कलाकृति है न ऐतिहासिक महत्व की वस्तु जिसे सहेजकर किसी संग्रहालय में रखा जाये। फिर भी कोमलदा ने झाड़ू को ही अपने संग्रहालय में केंद्रीय स्थान दिया। उनका यह चुनाव चौंका देने वाला है परंतु नये विचारों को दिशा देने वाला भी है।

किसी भी स्थान को साफ कर उसे व्यवस्थित करना झाड़ू की मूल क्रिया है। इस तथाकथित तुच्छ चीज के बगैर दुनिया का अस्तित्व असंभव है। झाडू़ की दुनिया की टोह लेने पर उसमें निहित मानवीय और सामाजिक ज्ञान की संभावनाओं से हम अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते। घास, झाड़ियां, पेड़, पौधे, टहनियां, ये सारे प्राकृतिक स्रोत झाड़ू बनाने के काम आते हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलायें आसपास पाई जाने वाली पत्तियों, टहनियों, सींकों और बचे-खुचे सामान से झाड़ू बना लेती हैं। स्थानीय लोगों के ज्ञान और उनकी सृजनशीलता का यह एक आदर्श उदाहरण है। अरना–झरना संग्रहालय में प्रदर्शित अधिकांश झाड़ू इसी प्रकार बनाये गये हैं। साथ ही व्यावसायिक स्तर पर बिक्री हेतु बनाये गये झाड़ू भी यहां हैं। बनावट, आकार और सामग्री के आधार पर इन झड़ुओं की विविधता में कोई कमी नहीं है।

राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों से सौ से भी ज्य़ादा झाड़ू यहां एकत्रित हैं। परंतु अरना–झरना संग्रहालय का मंतव्य मात्र संग्रहण नहीं है वरन् थार रेगिस्तान की वानस्पतिक संपदा और दैनिक जीवन को जोड़ने वाले सूत्र को जानना, समझना और अंकित करना है।



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