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कोमलदा
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कोमल कोठारी
(१९२९–२००४)
कोमलदा के कार्य को किसी भी सांचे में ढालना लगभग असंभव है। वे किसी विश्वविद्यालय के अकादमिक नहीं थे। परंतु लोकवार्ता, लोक संगीत और पारंपरिक ज्ञान तंत्रों की उनकी ऐसी गहरी समझ थी कि अध्ययन से जुड़े अनेक उत्तम विद्वान सतत उनके निकट संपर्क में रहे।

लोक संगीत के निष्पादन में तो कोमलदा एक प्रवर्तक माने जाते हैं। राजस्थानी लोक संगीत की धारा को उन्होंने एक नई दिशा दी। इस संगीत की संपदा को एकत्रित कर उसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर नई पहचान दिलाई।

सक्रियता वादियों के बीच वे खेती, सिंचाई, कचरा प्रबंधन जैसे मसलों के सटीक आकलन के लिये जाने जाते रहे। पारिस्थिति विज्ञान संबंधी उनकी समझ और पारंपरिक सिंचाई तंत्रों के बारे में उनकी जानकारी सर्वविदित है।

अपने जीवंत वार्तालाप और सुनने वालों को घंटों तक बांधे रखने की क्षमता के लिये वे प्रियजनों द्वारा याद किये जाते है। वे एक ग्राम वासी से बात कर रहे हों या किसी अकादमिक से, भिन्न ज्ञान तंत्रों को जोड़ने वाले सूत्र ढूंढ़ लेने का उनमें विलक्षण गुण था। अपनी बातों को लोगों के सामने सादगी और सरलता से प्रस्तुत करने की उनकी कला भी असाधारण थी।
 
कोमलदा लोक गायकों के साथ लोक कलाकारों के साथ कोमलदा
 
अपनी कर्म यात्रा की शुरुआत कोमलदा ने अपने निकटस्थ मित्र, कहानीकार विजयदान देथा के साथ की। दोनों ने मिलकर बोरुंदा गांव में रूपायन संस्थान की स्थापना की। वृत्तांत, कहानियों, गीतों और अन्य लोक साहित्य को कृषि, जाति- व्यवस्था, जल अधिकारों जैसे जीवन के संदर्भो के साथ जोड़कर उसका अध्ययन करना संस्था का मूल प्रयास था। कोमलदा ने राजस्थान के सुदूर गांवों की कई यात्रायें कीं। अनुभवजन्य अवलोकन और विस्तृत क्षेत्र कार्य उनकी कार्य प्रणाली का मूलमंत्र रहे।

जोधपुर स्थित संगीत नाटक अकादमी के पहले सचिव के रूप में उन्होंने लंगा और मांगणियार जातियों की संगीत परंपरा का अवलोकन प्रारंभ किया। १९५० के दशक में यह संगीत परंपरा बिखरी हुई थी। इसको जानने समझने वाले इन जातियों के यजमान ही थे। परंतु आज इन जातियों के संगीत को विश्व भर में प्रतिष्ठा प्राप्त है। इनको सुनने वाले विश्व के हर कोने में है। इन जातियों को प्राप्त पहचान और प्रतिष्ठा में कोमल दा का योगदान उल्लेखनीय है।

१९८० के दशक में कोमल दा ने जोधपुर को पुनः अपनी कर्म भूमि बनाया। फोर्ड फाउंडेशन की मदद ने उनके कार्य को सुदृढ़ता प्रदान की। लोक संगीत की रिकॉर्डिंग और उसका प्रलेखन, मौखिक इतिहास, वंश-वृत्तांत और लोक कलाओं की प्रस्तुति इन सारे कार्यों में वह तल्लीन रहे। साथ ही संगीत के कार्यक्रमों का आयोजन, सेमीनार और वर्कशॉप पर भी उनका ध्यान रहा। वैश्वीकरण के प्रभाव के चलते, पारंपरिक ज्ञान क्षेत्रों पर प्रभाव और उनकी नई दिशाओं को समझने के लिये वे प्रयासरत रहे।

कोमल दा की इतने भिन्न कार्यों और क्षेत्रों में रुचि और हस्तक्षेप ने ही शायद उनके मन में संग्रहालय की परिकल्पना को रूप दिया - एक ऐसा स्थल जहां मरूधर के विभिन्न ज्ञान के रूपों को समाहित किया जा सके।

अपने अंतिम दिनों में सेहत ठीक न होने के बावजू़द उन्होंने संग्रहालय के निर्माण को अपना पूरा ध्यान दिया। उनकी जीवन यात्रा संग्रहालय बनने से पहले ही समाप्त हो गई पर वे ही अरना-झरना संग्रहालय के प्रवर्तक और स्वप्न दृष्टा हैं।
 
घर पर कलाकारों के साथ विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए
संग्रहालय की नींव रखते हुए
 
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