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अरना-झरना संग्रहालय
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परिचय

अरना-झरना संग्रहालय के ज्ञान का मुख्य स्रोत राजस्थान की विभिन्न जातियों के दैनिक जीवन की संस्कृति है। इस संग्रहालय को सामान्य जीवन की प्रयोगशाला माना जा सकता है, जो इस विचारधारा को पोषित करता है कि लोक जीवन सदैव ही समसामयिक रहा है। प्रारंभिक काल से ज्ञानार्जन की पद्धतियों व कौशल में दक्ष तथाकथित पारंपरिक जातियाँ मात्र एक बीते हुये समय की निशानी नहीं हैं बल्कि इस गतिशील वर्तमान का हिस्सा हैं।

इन सिद्धान्तों का सटीकता से आकलन करने के लिये, इस संग्रहालय की पहली प्रायोजना एक ही विषय –  झाड़ू पर केंद्रित है। यहां राजस्थान के सुदूर क्षेत्रों से एकत्रित किये गये सैंकड़ो झाड़ू हैं। परंतु यह मात्र झाड़ुओं का संग्रहण एवं प्रदर्शन नहीं है और न ही यह मात्र आंचलिक जीवन की झांकी है, वरन् झाड़ू के प्रयोग से जुड़े विभिन्न संदर्भ –  जैसे उसे बनाने की स्थानीय विधियाँ और उपयोग किये जाने वाले प्राकृतिक स्रोत, झाड़ू बनाने का अर्थ तंत्र और उसकी मितव्ययता और झाड़ू से जुड़ी मान्यतायें, धारणायें तथा मिथकों को एक सूत्र में जोड़ने की कोशिश है।

अरना-झरना संग्रहालय ने झाड़ू प्रदर्शनी के माध्यम से विभिन्न विधाओं को जोड़ने वाली एक सहयोगात्मक पद्धति का विकास किया है और निम्नलिखित आयामों को अपनाया हैः

खजूर से बने झाड़ू
  • भौतिक संस्कृति पर शोध
  • धरातलीय सांस्कृतिक वृत्तियों को अंकित करने के लिये वैकल्पिक संयोजन व प्रदर्शन की पद्धतियों का विकास
  • संस्कृति के विकासात्मक आयाम को पुनर्परिभाषित कर यह जताना कि संस्कृति न वस्तुपरक है न मात्र एक उपयोगी साधन वरन् वह मानव जीवन का अविभाज्य अंग है।

स्थानीय वास्तविकता से जुड़े होने के बावजूद अरना-झरना मरू संग्रहालय विश्व के तेजी से बदलते हुए अर्थतंत्र के प्रति भी सजग है। इसीलिये यह संग्रहालय विश्वस्तर पर सहभागिता के लिये भी प्रयासरत है।

 
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